बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

जन ऊर्जा बनाम परमाणु ऊर्जा

।। प्रफ़ुल्ल बिदवई ।।
भारत के लिए ऐसे संयंत्र का निर्माण आत्मघाती कदम होगा. ये संयंत्र स्वास्थ्य और जान-माल के भीषण खतरों की कीमत पर बिजली मुहैया करायेंगे. जबकि अक्षय ऊर्जा के रूप में हमारे देश में परमाणु ऊर्जा के अत्यंत सुरक्षित और किफ़ायती विकल्प उपलब्ध हैं.
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा अपने दक्षिण भारत के दौरे के दौरान कुडनकुलम परमाणु संयंत्र के खिलाफ़ आंदोलन कर रहे लोगों के तिरस्कार का इससे अच्छा तरीका नहीं हो सकता था. वे आंदोलकारियों के प्रतिनिधियों से 7 अक्तूबर को बात करने के लिए राजी तो हो गये, लेकिन इस दौरान परमाणु ऊर्जा विभाग के सचिव श्रीकुमार बनर्जी ने प्रतिनिधियों को सिर्फ़ परमाणु ऊर्जा के फ़ायदों का लेक्चर सुना दिया. यह बैठक परियोजना को रद करने की मुख्य मांग के संबंध में विचार के लिए हुई थी. इस मांग को सौ से अधिक लोगों ने 12 दिन तक अनशन कर अपना नैतिक समर्थन दिया था, जिसके बाद तमिलनाडु सरकार परियोजना के निर्माण कार्य को स्थगित करने पर मजबूर हो गयी थी.
आंदोलन के प्रतिनिधियों को मुखर्जी का भाषण झेलना पड़ा, जिन्होंने हाल में भारतीय वैज्ञानिक समुदाय को शर्मिदा किया था. जापान में मार्च में भीषण तबाही मचाने वाली फ़ुकुशिमा संयंत्र की दुर्घटना के बाद उन्होंने इसकी गंभीरता को खारिज कर दिया था. उन्होंने कहा था कि यह कोई परमाणु आपातकाल नहीं, केवल एक रासायनिक प्रतिक्रिया है!
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पहले कुडनकुलम में रूस निर्मित दोनों परमाणु रियेक्टरों का काम रोकने का वादा किया, लेकिन तत्काल बाद अपनी बात से मुकर गये. तब प्रदर्शनकारियों ने फ़िर से अनशन शुरू कर दिया और परियोजना स्थल पर उनके समर्थन में करीब दस हजार लोग पहुंच गये.
आंदोलनकारियों के साथ उपेक्षित और दिग्भ्रमित बच्चों की तरह व्यवहार नहीं किया जा सकता है, जिन्हें अनुशासन सिखाने के लिए एक कोच की जरूरत होती है. उनके नेता जाने-माने पेशेवर लोग हैं. मसलन एसपी उदयकुमार अमेरिका के विश्वविद्यालयों में पढ़ा चुके हैं. एम पुष्पआर्यन जाने-माने वकील हैं. उनके तर्क विचारणीय हैं. यहां हजार मेगावाट के दो रियेक्टर निर्माणाधीन हैं, जिनसे पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन नहीं किया गया है. इन्हें पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी इआइए (इन्वायर्नमेंटल इंपैक्ट एसेसमेंट) की प्रक्रिया शुरू होने से पांच साल पहले मिली थी. इसमें परमाणु रियेक्टर के आंतरिक खतरों का ख्याल नहीं रखा गया था. ये रियेक्टर रोजाना लाखों लीटर ताजे पानी का उपयोग करेंगे और गर्म पानी को समुद्र में छोड़ेगे. इससे मछलियों का जीवन संकट में पड़ जायेगा, जिस पर तटीय इलाकों के लाखों लोग आश्रित हैं. ये घनी आबादी वाले क्षेत्र के एक किलोमीटर के दायरे में बन रहे हैं, जबकि नियम कहता है कि परमाणु संयंत्र के 1.6 किलोमीटर के दायरे में आबादी नहीं होनी चाहिए. इन रियेक्टरों से नियमित रूप से अपशिष्ट पदार्थ निकलेंगे. रेडियोधर्मिता युक्त उत्सर्जन भी होगा, जो एक ऐसा जहर है जिसे न तो आंखों से देखा जा सकेगा और न ही इसका गंध महसूस होगा.
सात देशों के 136 परमाणु संयंत्र स्थलों के वैज्ञानिक अध्ययनों में इसके आसपास के बच्चों में ल्यूकेमिया (एक प्रकार का रक्त कैंसर) की दर काफ़ी अधिक पायी गयी है. यहां जन्मजात विकृति, अंग क्षति और वयस्कों में भी कैंसर के मामले अधिक पाये गये हैं. परमाणु गतिविधियों से ऐसे अपशिष्ट पदार्थ पैदा होते हैं, जो हजारों साल तक नष्ट नहीं होते. विज्ञान अब तक इनके सुरक्षित निपटान के तरीके नहीं तलाश पाया है. इसके अलावा चेनरेबिल और फ़ुकुशिमा जैसी प्रलयंकारी दुर्घटनाओं की आशंका दुनिया के सभी परमाणु रियेक्टरों में बनी रहती है. चेनरेबिल में अलग-अलग अनुमानों के मुताबिक 34 से 95 हजार लोग मारे जा चुके हैं और यह संख्या अब भी बढ़ रही है. रेडियोधर्मी प्रदूषण के कारण दुर्घटना के 25 साल बाद भी करीब तीन लाख लोग अपने घर नहीं लौट सकते हैं. इसी तरह फ़ुकुशिमा में संकट अब भी नहीं टला है, जबकि 50 अरब डॉलर खर्च किये जा चुके हैं.
इस तरह हम कह सकते हैं कि परमाणु रियेक्टर मुश्किल से नियंत्रित होने वाले परमाणु बम हैं, जहां लगातार होने वाली श्रंखलाबद्ध परमाणु प्रतिक्रियाओं को पानी डालकर और सुरक्षा उपकरणों की मदद से काबू किया जाता है. लेकिन ये उपाय विफ़ल भी हो सकते हैं. इन्हें किसी कारण से पर्याप्त ठंडक नहीं मिलने पर इंधन लगातार गर्म होते चले जाते हैं और ये तबाही मचाने लगते हैं. यही फ़ुकुशिमा में हुआ. इसके संचालकों का कहना है कि रिक्टर पैमाने पर 9 की तीव्रता वाले भूकंप को यह रियेक्टर सहन नहीं कर पाया. बाद में आयी सुनामी ने खतरे को और बढ़ा दिया, जिससे यह भीषण दुर्घटना हुई. कारण चाहे जो भी रहे हों, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि परमाणु रियेक्टर कभी भी तबाही मचा सकते हैं.
कुडनकुलम में स्थानीय पंचायत, चर्च और धार्मिक संस्थाओं को मिलाकर बना संगठन इस खतरे को समझता है. वे संभवत: रूस निर्मित परमाणु संयंत्रों के बारे में भी काफ़ी कुछ जानते हैं. नार्वे के एक प्रमुख संगठन ने रूस के परमाणु सुरक्षा विशेषज्ञों से बातचीत के बाद एक स्पेशल रिपोर्ट जारी की है, जिसमें कहा गया है कि रूसी रियेक्टर आपदा प्रबंधन के लिए काफ़ी कम तैयार होते हैं. इस रिपोर्ट को तैयार करने में अनेक अन्य स्र्ोतों से सूचनाएं जुटायी गयी हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि रूसी रियेक्टरों में 31 गंभीर खामियां हैं. खासकर इनमें भूकंप के खतरों से बचने के पर्याप्त उपाय नहीं हैं. ये खुलासे सचेत करने वाले हैं. भारत के लिए ऐसे संयंत्र का निर्माण आत्मघाती कदम होगा. ये संयंत्र स्वास्थ्य और जानमाल के भीषण खतरों की कीमत पर बिजली मुहैया करायेंगे. जबकि अक्षय ऊर्जा के रूप में हमारे देश में परमाणु ऊर्जा के अत्यंत सुरक्षित और किफ़ायती विकल्प उपलब्ध हैं. भविष्य भी अक्षय ऊर्जा का ही है.
।। लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं ।।

’कब्जा करो’ की चपेट में दुनिया


।। पुष्परंजन ।।
भारत में इस समय 29 विदेशी बैंक काम कर रहे हैं. इनमें से कई के विरुद्ध यूरोप-अमेरिका में बवाल मचा हुआ है. ’ऑक्यूपाइ वॉल स्ट्रीट‘ के आंदोलनकारी यदि यहां भी सड़कों पर उतरे, तब क्या होगा?
कल तक कैरो के तहरीर चौक के फ़ेसबुकिया आंदोलन से आनंद उठाने वाले अमेरिकी-यूरोपीय नेता अब अपने घर में लगी आग से अक-बक हैं. कर्ज और बेरोजगारी से बेहाल यहां के शहरी गरीबों और मध्यवर्ग के लिए अब यह बर्दाश्त से बाहर है कि सरकारें दिवालिया बैंकों और कारपोरेट्स को ’बेल आउट पैकेज‘ दे-देकर उनके हितों की रक्षा कर रही हैं. इसी के खिलाफ़ इन लोगों ने न्यूयार्क के जूकोटी पार्क से गत 17 सितंबर को शुरू किया था ’ऑक्यूपाइ वॉल स्ट्रीट‘ आंदोलन.
जूकोटी पार्क, जिसे कभी ’लिबर्टी पार्क‘ भी कहते थे, उसी सड़क पर है जहां वर्ल्ड ट्रेड सेंटर था. यह जगह अमेरिकी शेयर बाजार ’वॉल स्ट्रीट‘ से कोई चार किलोमीटर दूर निचले मैनहट्टन वाले इलाके में है. अब अमेरिका के 70 शहर इस आंदोलन की चपेट में हैं. आंदोलन का असर पूरे यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में भी दिख रहा है. कई जगहों पर दंगे भी हुए हैं. एशिया के बिजनेस हब हांगकांग, ताइपे, टोक्यो में आंदोलनकारी सड़कों पर उतर चुके हैं, इसलिए भारत में ’ऑक्यूपाइ वॉल स्ट्रीट‘ वाले नजारे देखने को तैयार रहिए.
कनाडा में बाजारवाद और उपभोक्तावाद के विरोध में ’एब्स्टर्स‘ नाम से एक पत्रिका निकलती है. इसकी एक लाख 20 हजार प्रतियां छपती हैं और इसमें कोई विज्ञापन नहीं होता. इसे प्रकाशित करने वाली संस्था ’एब्स्टर्स मीडिया फ़ाउंडेशन‘ ने इस साल जुलाई में सुझाव दिया था कि कॉरपोरेट और बैकों को संरक्षण देनेवाली सरकारों के खिलाफ़ हल्ला बोला जाना चाहिए. इसके लिए ’एब्स्टर्स मीडिया फ़ाउंडेशन‘ ने इमेल, ट्विटर, ब्लॉगिंग, फ़ेसबुक पर लाखों लोगों के विचार लिये, उन्हें संगठित किया और शुरू करा दिया आंदोलन. इस समय ’ऑक्यूपाइ वॉल स्ट्रीट‘ पेज के कोई एक लाख 70 हजार फ़ैंस हैं. दुनिया के 1300 शहरों में ’राइटिंग शो इवेंट‘ चला कर 82 देशों की सरकारों की नींद हराम करने की इनकी योजना है.
अमेरिकी सत्ता को चला रहे डेमोक्रेट, जिनकी विचारधारा को हम अधिक उदार मानते हैं, में भी ’ऑक्यूपाइ वॉल स्ट्रीट‘ को लेकर घबराहट है. कारण 2012 का आम चुनाव है. दूसरी ओर, कंजर्वेटिव कहे जानेवाले रिपब्लिकन नेता अमेरिकी पूंजीपतियों और बैंक चलाने वाले कॉरपोरेट्स को कहीं से नाराज नहीं करना चाहते. 2012 के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति प्रत्याशी हर्मन कैन ने इसे ’एंटी कैपिटलिस्ट’ यानी पूंजीपतियों के विरुद्ध खड़ा किया गया आंदोलन कहा है. कैन कहते हैं, ’वॉल स्ट्रीट को क्यों कोसते हो. न ही बड़े बैंकों को दोष दो. यदि तुम अमीर नहीं हो और तुम्हारे पास काम-धंधा नहीं है, तो खुद को क्यों नहीं कोसते.‘ कैन के इस बयान से अमेरिकी राजनेताओं की संवेदनहीनता का अंदाजा आप स्वयं लगा सकते हैं. यह व्यक्ति यदि अमेरिका का राष्ट्रपति चुन लिया गया, तो दुनिया में गरीबी का क्या होगा?
अमेरिका समेत पूंजीवादी सरकारों के विरुद्ध जो ताकतें हैं, उनकी टिप्पणियां भी बहती गंगा में हाथ धोने के बराबर हैं. कम्युनिस्ट शासन व्यवस्था में कई बार न्यूज एजेंसियों के माध्यम से सरकार का पक्ष रख दिया जाता है. इसी तर्ज पर चीन की सरकारी न्यूज एजेंसी ’शिन्ह्वा‘ की टिप्पणी थी, ’अमेरिका अब अपने घर को दुरुस्त करे, जो गलत राजनीतिक-आर्थिक नीतियों से खराब हुआ है.‘ उत्तर कोरिया ने न्यूज एजेंसी ‘डीपीआरके‘ के माध्यम से कमेंट किया कि यह शोषण और पूंजीपतियों के दमन के खिलाफ़ आंदोलन है.
रूस के पूर्व राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव इसे ’पेरस्त्रोइका‘ की वापसी और सुपर पावर का भरभरा कर गिरना मानते हैं. ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई कहते हैं कि भ्रष्ट बुनियाद को अमेरिकी जनता भुगत रही है. पोलैंड के पूर्व राष्ट्रपति लेख वालेसा ने आंदोलन को पूर्ण समर्थन दिया है. बेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो चाव़ेज ने वॉल स्ट्रीट आंदोलनकारियों को समर्थन देते हुए ’भीषण दमन‘ की भर्त्सना की है. दुनिया भर के मजदूर संगठनों के इसके समर्थन में उतर जाने से यही संदेश जा रहा है कि बैंकिंग व्यवस्था और कॉरपोरेट्स के विरुद्ध बड़े पैमाने पर लामबंदी हो रही है.
यूरोप भी इस बार बैंकों को बख्शने के मूड में नहीं दिख रहा है. यूरोपियन कमीशन के अध्यक्ष खोसे मानुअल बारेसो ने तो मांग कर दी है कि जो ’रफ़ बैंकर्स‘ हैं, जो बैंक नियमों को नहीं मानते, उन पर आपराधिक मामले चलने चाहिए. खोसे मानुअल बारेसो ’फ़ोस्र्ड कैपिटलाइजेशन‘ यानी ’बाध्यकारी पूंजीकरण‘ की नकेल फ़िर से बैंकों पर कसना चाहते हैं. इसका अर्थ यह होता है कि प्राइवेट बैंक सरकारी अनुदान लेंगे और उनके कामकाज में सरकारी दखल रहेगा. डॉयचे बैंक के प्रमुख जोसेफ़ आकरमान ने कहा कि ’फ़ोस्र्ड कैपिटलाइजेशन‘ को टालने की हर संभव कोशिश करूंगा. करेंसी और कर्ज संकट के लिए यूरोप के नेता जिम्मेदार हैं, हम नहीं.
ब्रिटिश विदेश मंत्री विलियम हेग मानते हैं कि बैंकिंग प्रणाली में बहत्तर छेद हैं. यूरोपियन सेंट्रल बैंक के भावी प्रमुख मारियो द्रागी ने स्वीकार किया कि युवाओं का आक्रोश बिल्कुल सही है. जर्मनी के हेम्बर्ग में ’एचएसएस नोर्डबांक‘ को पिछले हफ्ते प्रदर्शनकारियों ने घेर लिया था. फ्रेंकफ़र्ट में यूरोपियन सेंट्रल बैंक के आगे तो आंदोलकारियों ने टेंट गाड़ दिये. ऐसा नजारा यूरोप के कई बड़े शहरों में दिख रहा है. जर्मनी की मैर्केल सरकार में जूनियर गंठबंधन पार्टनर ’फ्री डेमोक्रेट‘ पूंजीपतियों की समर्थक पार्टी मानी जाती है. ’फ्री डेमोक्रेट‘ नेता राइने ब्रूडरले ने कहा कि सदियों पहले बैंक जैसे थे, आज भी उसी र्ढे पर हैं. यदि उन्होंने अपना ’होमवर्क‘ नहीं किया, तो उनके हाथ पकड़ने से हम हिचकेंगे नहीं.

भारत में इस समय 29 विदेशी बैंक काम कर रहे हैं. इनमें से कई ऐसे विदेशी बैंक और कॉरपोरेट हाउसेज हैं, जिनकी बेईमान नीतियों के विरुद्ध यूरोप-अमेरिका में बवाल मचा हुआ है. सवाल यह है कि ’ऑक्यूपाइ वॉल स्ट्रीट‘ के आंदोलनकारी यदि यहां भी सड़कों पर उतरे, तब क्या तसवीर होगी?
।। ईयू-ऐशया न्यूज के नयी दिल्ली स्थित संपादक हैं ।।

गरीबी का दुश्चक्र

सुधांशु रंजन

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गरीबी रेखा पर भड़के विवाद ने योजना आयोग की भूमिका के साथ शासन की नीतियों और उद्देश्यों के बारे में भी सवाल खड़ा किया है। संविधान के चौथे अध्याय में राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों का उल्लेख है, जो अदालतों द्वारा लागू तो नहीं किए जा सकते, किंतु यह स्पष्ट किया गया है कि वे शासन के लिए मूलभूत सिद्धांत के रूप में काम करेंगे। अनुच्छेद 38 में कल्याणकारी राज्य की बात कही गई है। वर्ष 1978 में 44वां संविधान संशोधन कर इस अनुच्छेद में यह जोड़ा गया कि सरकार विभिन्न गुटों के बीच असमानता दूर करने का प्रयास करेगी।

सबसे पहले दादाभाई नौरोजी ने अपनी पुस्तक पॉवर्टी ऐंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया के जरिये गरीबी का मुद्दा उठाया था। आजादी के बाद जब योजनाबद्ध तरीके से आर्थिक विकास की संरचना बनाई गई, तो योजना आयोग का उद्देश्य गरीबी उन्मूलन न होकर देश को उद्योग एवं उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना था। गरीबी पर कई वर्षों तक कोई व्यापक चर्चा देश में नहीं हुई। संविधान की छठी अनुसूची में भी ग्रामीण विकास, श्रम आदि की तो चर्चा है, किंतु गरीबी की नहीं। गरीबी के सवाल को डॉ राममनोहर लोहिया ने लोकसभा में 1963-67 के दौरान मजबूती से उठाया। और 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया।

फिलहाल गरीबी का मुद्दा बड़ा मुद्दा बना हुआ है। योजना आयोग द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर गरीबी रेखा के बारे में हलफनामे को लेकर पूरा देश उद्वेलित हो गया, जिसमें कहा गया था कि शहरों में 32 और ग्रामीण क्षेत्रों में 26 रुपये प्रतिदिन कमाने वाले गरीब नहीं है। 2004-05 में गरीबी रेखा और कम रखी गई थी, जो शहरों के लिए साढ़े सत्तरह एवं गांवों के लिए 12 रुपये थी। सुखद है कि राष्ट्रीय विरोध के बाद योजना आयोग ने अपना पक्ष बदल दिया है।

वर्ष 2001 में सर्वोच्च न्यायालय में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ने एक जनहित याचिका दायर कर यह निर्देश जारी करने की प्रार्थना की थी कि भारतीय खाद्य निगम के गोदामों की कमी के कारण जो खाद्यान्न सड़ रहे हैं, उन्हें गरीबों में मुफ्त बांट दिया जाए। केंद्र सरकार ने आपत्ति की कि यह नीतिगत मसला है, जिस पर अदालत निर्देश नहीं दे सकती। यह मामला अब तक चल रहा है। योजना आयोग अब भी मानता है कि ऐसे निर्देश देकर न्यायपालिका अपनी सीमा से बाहर जा रही है। यह अदालत नहीं तय कर सकती कि गरीबों की पहचान कैसे हो।

गरीबी रेखा से नीचे की जनसंख्या की गणना हर पंचवर्षीय योजना के पहले की जाती है। वर्ष 1992 में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने आठवीं पंचवर्षीय योजना 1992-97 के लिए यह गणना करवाते हुए सुझाव दिया था कि 11,000 रुपये की वार्षिक आय को गरीबी रेखा माना जाना चाहिए। इसे बहुत अधिक बताते हुए योजना आयोग ने खारिज कर दिया। यही वह समय था, जब ग्रामीण विकास मंत्रालय के कार्यक्षेत्र पर योजना आयोग का कब्जा हो गया। गौरतलब है कि 1992 में जो पैमाना तय किया गया था, वह आज से ज्यादा है। इस तरह की गणना 1997 तथा 2002 में भी करवाई गई, लेकिन विभिन्न कारणों से 2007 में ऐसी गणना नहीं हो पाई। 11वीं पंचवर्षीय योजना के लिए ऐसी गणना करवाने के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 2008 में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया। एन सी सक्सेना की अध्यक्षता वाली इस समिति ने अगस्त, 2009 में रिपोर्ट सौंप दी, जिसे राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्र सरकार के संबद्ध मंत्रालयों को उनकी टिप्पणी के लिए भेज दिया गया।

समस्या की शुरुआत दरअसल 1993 में हो गई थी, जब सार्वजनिक जन वितरण प्रणाली को लक्षित जन वितरण प्रणाली में बदल दिया गया। इसके कार्यकलाप की जांच करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी पी वाधवा की अध्यक्षता में गठित आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस व्यवस्था में भ्रष्टाचार तथा लूट-खसोट है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जन वितरण प्रणाली में कई तरह के भ्रष्टाचार और खामियां हैं। इसका खाद्यान्न अन्यत्र चला जाता है, क्योंकि इसमें नौकरशाहों, राशन दुकान के मालिकों और बिचैलियों का घृणित तंत्र कार्य करता है। आयोग ने लिखा भी कि फरीदाबाद की एक महिला के पास 925 कार्ड पाए गए।

गरीबों की पहचान का काम 1972 में प्रारंभ हुआ, जब दो रुपये प्रतिदिन की आमदनी गरीबी रेखा के रूप में निर्धारित की गई थी। इस पैमाने को बदला नहीं गया, क्योंकि इससे कई जटिलताएं पैदा होतीं। उस दो रुपये का मूल्य आज 32 रुपये हो गया है। प्रसिद्ध पोषण वैज्ञानिक सुखात्मे ने पहली बार यह अवधारणा दी कि शहरों में 2,400 तथा गांवों में 2,100 कैलोरी का उपभोग जीने के लिए आवश्यक है। उस समय गरीबी का अर्थ था, भुखमरी। और गरीबी से बचने के लिए नियत कैलोरी ग्रहण करना आवश्यक था। वाई के अलघ आयोग ने सुखात्मे के पैमाने को सही माना। पर योजना आयोग का समर्थन करने वाले मानते हैं कि कैलोरी को पैमाना बहुत पुराना हो चुका है।

योजना आयोग का उद्देश्य है गरीबी कम करना। आजादी के समय देश की आबादी 32 करोड़ थी। अभी उससे कहीं ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की है, जबकि गरीबी रेखा बहुत नीचे रखी गई है। इसकी तुलना अमेरिका से करें, तो फर्क पता चलेगा, जहां 11,139 डॉलर से कम वार्षिक आय वालों को गरीब माना जाता है। 
(अमर उजाला से साभार)

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

बापू के साथ किया था सत्याग्रह

- 99 की उम्र में डॉ शीलवती राठौर के इरादे चट्टान की तरह मजबूत -
ग्वालियरः डॉक्टर शीलवती राठौर चार जनवरी 2012 को 99 साल की हो जायेंगी. आज भी वह बड़ी से बड़ी मुश्किल का डट कर मुकाबला करने का हौसला रखती हैं. गुलाम भारत के समय के आंदोलन की बात हो या भारत विभाजन की, इन्होंने हर समय अपने साहस का परिचय दिया है.
अंग्रेजों के खिलाफ़ नमक आंदोलन में वे महात्मा गांधी के साथ कदम से कदम मिला कर चलीं. स्वदेशी आंदोलन में भी वे बिना किसी की परवाह किये नाम बदल कर शामिल हईं और विदेशी वस्तुओं की होली जलायी. इसी तरह भारत विभाजन के समय जब मुसलिम परिवार पर विपदा आयी, तो बंदूक लेकर उनकी रक्षा के लिए भी वे आगे आ गयीं.
नाम बदल-बदल कर शामिल हुईं आजादी के आंदोलन में
सन् 1942 में महात्मा गांधी ने विदेशी वस्तुओं को जलाने का आह्वान किया था. मेरे पति आरके सिंह शासकीय सेवा में थे. इसलिए सीधे तौर पर मैं इस आंदोलन में शामिल नहीं हो सकती थीं. मैंने अपना नाम बदला और अपनी कई सहेलियों को भी नाम बदल कर इस आंदोलन में शामिल करवाया. इससे पहले गांधी जी के नमक आंदोलन में भी मैं अपनी मां के साथ शामिल हई थी.
मैंने जब उठा ली थी बंदूक
भारत-पाक विभाजन के बाद देशभर में दंगे हए थे. ग्वालियर में भी दंगा हआ. दंगाइयों से बचती हई एक मुसलिम महिला मेरे घर आ गयी, उसके पीछे दंगाई भी थे. मैंने अपने घर में उस महिला को शरण दी और उसे बचाने के लिए बंदूक लेकर छत पर पहंच गयी. मैंने दंगाइयों को ललकारा तो दंगाई चले गये और वह महिला बच गयी.
सब प्रभु की देन
मैंने कुछ नहीं किया है, सब प्रभु ने करवाया. आज जब उस समय के बारे में सोचती हं, तो ताज्जुब होता है कि इतना सब मैंने कैसे कर लिया. अब भी ऐसी कोई स्थिति निर्मित होती है, तो मैं संघर्ष करने में पीछे नहीं हटूंगी.
शीलवती का संदेशः महिलाओं में इतनी शक्ति होती है कि वह घर, समाज और देश के लिए प्रगति के द्वार खोल सकती हैं. महिला विनम्र, सहनशील हो तो वह परिवार को एक डोर में बांध सकती है. यही भूमिका उसकी समाज और देश के विकास में भी सहायक होती है. आज की पीढ़ी ज्यादा पढ़ी-लिखी है, लेकिन स्वार्थी हो गयी है. उसका समाज से कोई लेना-देना नहीं है.
(प्रभात खबर से साभार)

बुधवार, 14 सितंबर 2011

केंद्र लाचार, असहाय या अक्षम!

।। हरिवंश ।।
खुद सरकार के कर्ता-धर्ता लोगों के बयानों से ही आतंकवाद के प्रति सरकार की भूमिका, लापरवाही या विफलता जाहिर है. इसी तरह आतंकवाद के बाद दूसरा सबसे बड़ा मामला भ्रष्टाचार का है. उसके प्रति भी केंद्र का रुख समझ लें. प्रशासनिक भ्रष्टाचार से निबटने में बिहार ने वह काम कर कर दिखाया है, जो पूरे देश के लिए प्रेरक, सबक और अनुसरण करने योग्य है. भ्रष्टाचार से बने आइएएस के घर में स्कूल खोल कर. यह कहना सही होगा कि नौकरशाहों (जिसे लोहिया असली व स्थायी राजा कहते थे) के भ्रष्टाचार से निबटने की दिशा में बिहार ने देश को रोशनी दिखायी है. अगुवाई की है.
चंद्रशेखर जी की कही एक बात याद आती है. जेबी कृपलानी के प्रसंग में. पर देश और भविष्य से जुड़ी. कांग्रेस बंटवारे (1969) के पहले की बात है. युवा तुर्क के रूप में चंद्रशेखर और उनकी टोली, वाम कदमों की ओर कांग्रेस को ले जाना चाहते थे. वैचारिक संघर्ष तेज हो गया था. कांग्रेस के अंदर. विभिन्न सवालों पर ध्रुवीकरण. मुंबई कांग्रेस कार्यसमिति की एक बैठक में, एक शब्द को लेकर 12 घंटे बहस चली. चंद्रशेखर अकेले. अन्य एक तरफ़. इंदिरा जी के हस्तक्षेप से रात्रि भोजन के लिए बैठक खत्म हुई. ये बातें, उन दिनों मीडिया में सुर्खियों में थीं. कांग्रेस के अंदर ‘सिंडिकेट’ गुट ताकतवर था.
चंद्रशेखर व उनके युवा साथी, इसके खिलाफ़ थे. उन्हीं दिनों की बात है. दादा (आदर से कृपलानी जी इसी विशेषण से जाने जाते थे) ‘सेंट्रल हाल’ (संसद) में बैठे थे. चंद्रशेखर जी को देखा, तो बुलवाया. कहा, तुम जो कर रहे हो, उसका परिणाम जानते हो? कांग्रेस टूट जायेगी. यह देश के लिए अच्छा नहीं होगा. यह बात आजादी की लड़ाई का कद्दावर, विलक्षण, विद्वान, तेजस्वी और अनोखा नेता कह रहा था, जो आजादी के बाद ही कांग्रेस का रंग-ढंग देख, उसे त्याग दिया था. उनका कहना था कि यही एकमात्र पार्टी देश को जोड़नेवाली है. मध्य मार्गी है.
साझा संस्कृति और हर समूह को साथ लेकर चलने की बात करनेवाली. इसका स्वर्णिम अतीत रहा है, इसका विकल्प अब तक नहीं उभरा-बना है. अगर यह खत्म हो गयी, तो देश के हित में नहीं होगा.पर हाल के दिनों के इसके कामकाज, प्रवृत्ति और पहल को देख कर लगता है कि यह दल आत्मघात या आत्महत्या पर उतारू है. शायद इस दल के नेता नहीं जानते कि देश के लिए इस दल का क्या महत्व है? राज सत्ता का इकबाल, प्रताप, धमक, कानूनी डर और गलत करनेवालों के बीच भय खत्म हो जाये, तो फ़िर सरकार या संसद का क्या महत्व रह जायेगा?
हाल के देश के बड़े सात विस्फ़ोटों को लीजिए. इनमें से एक का भी सुराग नहीं मिल सका. 2010 में पुणे (17 मरे, 56 घायल) विस्फ़ोट, 2010 में ही बेंगलुरु स्टेडियम में विस्फ़ोट (17 घायल), 2010 में जामा मसजिद (2 मरे), 2010 में बनारस (2 मरे, 37 घायल), 2011 में मुंबई (26 मरे, 123 घायल ), 2010 में फ़िर से महरौली में विस्फ़ोट, अब 2011 में दिल्ली (12 मरे,76 घायल) में हुए विस्फ़ोटों की तह तक सरकार न पहुंच पाये, उसे आप क्या कहेंगे? यह विफ़लता नहीं, शासन के प्रताप, पहुंच और असर का जनाजा निकालना है. कांग्रेस यह आत्म मंथन भी भूल गयी कि वह गद्दी पर क्यों बैठी है?
शासन करने के लिए ही न ! वह शासन कहां है? ‘67 में गैर कांग्रेसी सरकारें जब विभिन्न राज्यों में शासन करने में नाकाम रहीं, तो विपक्ष में बैठी कांग्रेस का नारा था ’शासन करो या गद्दी छोड़ो’. आज यह नारा कांग्रेस के लिए लागू है या नहीं? इन सातों घटनाओं के वक्त प्रधानमंत्री, गृहमंत्री या कांग्रेस के बड़े नेताओं के बयान देख कर विश्‍लेषण करें, अद्भुत निष्कर्ष मिलेंगे. हर बार इनके बयान में कुछ समान बातें-विचार मिलेंगे कि यह कायराना हमला है. कि यह विस्फ़ोट आतंकवादियों के फ़स्ट्रेशन (निराशा) को दिखाता है. वगैरह-वगैरह. कायर कौन है? मारनेवाले या हत्यारों का कुछ न कर पानेवाले? हाल के एक भी संगीन मामले के दोषी को न पकड़पाने वाले अक्षम हैं या इतने बड़े देश की कथित बड़ी सुरक्षा ताकत को लगातार चुनौती देनेवाले? कौन कायर है, बहादुर है, सक्षम या अक्षम या असहाय है? क्या कांग्रेस या शासक दल इसकी नयी परिभाषा गढ़ने में लगे हैं?
शीर्ष पर शासन की क्या स्थिति है? यह की बड़े पदों पर बैठे लोगों के बयानों से ही समझ व जान लें? दिल्ली विस्फ़ोट के बारे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था में खामियां हैं, आतंकवादी इसका लाभ उठा रहे हैं. विस्फ़ोट के तुरंत बाद गृहमंत्री चिदंबरम ने लोकसभा में कहा कि विस्फ़ोटों या खतरों की जो सूचना इंटेलिजेंस ने दी थी, उसकी सूचना जुलाई में दिल्ली पुलिस को दे दी गयी थी. उसी दिन भारत सरकार के आंतरिक सुरक्षा के विशेष सचिव यू के बंसल ने टीवी पर बार-बार बयान दिया कि जुलाई में मिली सूचनाएं (जिसके संबंध में गृहमंत्री ने संसद में कहा) साफ़ और स्पष्ट नहीं थीं. अब आप इन तीनों बयानों को पढ़ कर इनके अंतर को समझ लें. ये तीन वे व्यक्ति हैं, जिनके हाथ में हमारी आपकी नियति, भाग्य और जीवन है. तीनों बयान परस्पर विरोधी. ऊपर में अगर एक स्वर नहीं है, तो नीचे क्या होगा?
इसी तरह बनारस में विस्फ़ोट हो गये, तो गृह मंत्रालय ने कहा कि हमें सूचनाएं थी, हमने यूपी पुलिस को सचेत किया था. इसी तरह मुंबई विस्फ़ोटों के बाद भी गृह मंत्रालय ने कहा हमने महाराष्ट्र-मुंबई पुलिस को भी आगाह कर दिया था. ऊपर से भारत सरकार के एक मंत्री ने फ़रमाया कि अब तो लोग इन विस्फ़ोटों के आदी हो गये हैं. और जीवन रुकता नहीं है. जले या कटे पर नमक. क्या ऐसे ही सरकारें चलती हैं? हर बार विस्फ़ोट के पहले सूचना मिल जाती है फिर भी विस्फोट हो जाते हैं? क्या बताना चाहती है सरकार, ऐसे बयानों से? अपनी अक्षमता.
दिल्ली की एक महिला (जिसके पति मारे गये) ने प्रधानमंत्री से कहा, आप हमें दो लाख सरकारी मुआवजा न दें, हमसे चार लाख ले लें, मेरे जीवित पति को लौटा दें. यह सत्ता के प्रति एक पीड़ित व्यक्ति का दर्द-आह है, जिसे ऊपर बैठे लोग समझ नहीं पा रहे या समझ कर भी अपनी सुरक्षित दुनिया में हैं. खुद सरकार के कर्ता-धर्ता लोगों के बयानों से ही आतंकवाद के प्रति सरकार की भूमिका, लापरवाही या विफलता जाहिर है. इसी तरह आतंकवाद के बाद दूसरा सबसे बड़ा मामला भ्रष्टाचार का है. उसके प्रति भी केंद्र का रुख समझ लें. प्रशासनिक भ्रष्टाचार से निबटने में बिहार ने वह काम कर कर दिखाया है, जो पूरे देश के लिए प्रेरक, सबक और अनुसरण करने योग्य है. भ्रष्टाचार से बने आइएएस के घर में स्कूल खोल कर. यह कहना सही होगा कि नौकरशाहों (जिसे लोहिया असली व स्थायी राजा कहते थे) के भ्रष्टाचार से निबटने की दिशा में बिहार ने देश को रोशनी दिखायी है. अगुवाई की है. पर केंद्र का रुख?
बिहार सरकार द्वारा उक्‍त आइएएस की जमीन-घर जब्त होने के बाद भी केंद्र ने उस अफसर के खिलाफ मुकदमे की अनुमति नहीं दी है. साथ में बिहार के दो अन्य आइएएस अफसरों के खिलाफ भी भ्रष्टाचार से जुड़े मुकदमे चलाने की अनुमति भी केंद्र ने नहीं दी है. केंद्रीय सेवाओं की पहली श्रेणी के अफसरों के भ्रष्टाचार से जुड़े बिहार के तीन सौ मामले अनुमति के लिए प्रधानमंत्री सचिवालय में अटके हैं (पढ़ें, दागी अफसरों को सजा दिलाने में केंद्र की दिलचस्पी नहीं, सुरेंद्र किशोर, जनसत्ता 6 सितंबर 2011). इसी तरह बिहार सरकार ने 2009 में बिहार विशेष अदालत अधिनियम 2009 विधायिका से पास करवा कर केंद्र को भेजा, उस पर भी राष्ट्रपति मुहर लगवाने में एक साल लगा.
क्या इसी लेट लतीफी के रास्ते केंद्र भ्रष्टाचार से भी निबटना चाहता है?आज आतंकवाद या भ्रष्टाचार पर केंद्र या शासक दल का यही एप्रोच (रवैया) है, तो कांग्रेस का भविष्य क्या होगा? कैग की लगातार आती रपटों में जिन भ्रष्टाचारों का उल्लेख या खुलासा हुआ है, वे देश को कहां ले जायेंगे? कांग्रेस भ्रष्टाचार और आतंकवाद का प्रकोप रोक पाने में इतनी लचर, असहाय या अक्षम क्यों साबित हो रही है? कहां हैं कांग्रेस की नयी पीढ़ी और उसके नेता?

9/11 की इतनी बड़ी कीमत!

जोसफ़ इ स्टिंगलिज
9/11 के बाद अलकायदा से जितना बड़ा खतरा दिख रहा था, अब नहीं है. पर इस स्थिति तक पहुंचने में अमेरिका ने जो विशाल कीमत चुकायी है, उसका नतीजा अगली पीढ़ियों को भी भुगतना पड़ेगा.
ग्यारह सितंबर 2001 के आतंकी हमले के पीछे अलकायदा का मूल मकसद अमेरिका को नुकसान पहुंचाना था. उन्होंने बड़ा नुकसान पहुंचाया भी, लेकिन जिस तरीके से पहुंचाया उसकी कल्पना शायद अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन ने भी नहीं की होगी. हमले के बाद राष्ट्रपति जार्ज बुश ने अमेरिका के बुनियादी सिद्धांतों से समझौता किया, अपनी अर्थव्यवस्था को कमतर आंका और अपनी सुरक्षा को भी कमजोर बना दिया.
9/11 के बाद अफ़गानिस्तान पर किये हमले को समझा जा सकता है. पर बाद में इराक पर आक्रमण का अलकायदा से कोई संबंध नहीं था, हालांकि बुश ने इसके लिंक जोड़ने की कोशिश जरूर की थी. अमेरिका का यह युद्ध जल्द ही बहुत खर्चीला साबित होने लगा जबकि शुरू में केवल 60 अरब डॉलर का अनुमान था.
इससे अमेरिकी अक्षमता और गलतबयानी उजागर हो गयी. लिंदा बिल्म्स और मैंने तीन साल पहले अमेरिकी युद्धों के खर्च का अनुमान लगाया था, तो आंकड़ा तीन से पांच खरब डॉलर तक पहुंच चुका था. गत तीन वर्षो में यह खर्च और अधिक हो चुका है. इतना ही नहीं, वहां से लौट रहे करीब आधे सैनिक विकलांगता का भुगतान पाने के हकदार हैं और अब तक छह लाख से अधिक सैनिकों को विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाएं मुहैया करायी जा चुकी है. हमारा अनुमान है कि अमेरिका को भविष्य में सैनिकों के विकलांगता मुआवजे और चिकित्सा सुविधा के एवज में 600 से 900 अरब डॉलर का भुगतान करना है. लेकिन सैनिकों की आत्महत्या (जो हाल के वर्षो में औसतन 18 प्रतिदिन तक पहुंच चुकी है) और उनके पारिवारिक बिखराव से हो रहे सामाजिक नुकसान की कीमत नहीं आंकी जा सकती.
यदि हम बुश को गलत बहाने के साथ अमेरिका और दुनिया के कई हिस्सों पर युद्ध थोपने के लिए माफ़ कर भी दें, तो भी इन युद्धों में जिस तरह से उन्होंने बड़ी राशि झोंकने की अनुमति दी, उसके लिए कोई बहाना नहीं चल सकता. यह इतिहास का पहला ऐसा युद्ध था, जिसका पूरा भुगतान कर्ज लेकर किया गया. अमेरिका ने जिस वक्त युद्ध शुरू किया, कर राहत के कारण बजट घाटा पहले से बढ़ रहा था, फ़िर भी 2001 में बुश प्रशासन ने कर राहत के दूसरे दौर की घोषणा की थी.
आज अमेरिका बेरोजगारी और बजट घाटे पर ध्यान केंद्रित कर रहा है. दोनों अमेरिका के भविष्य के लिए बड़े खतरे साबित हो रहे हैं, जिनकी जड़ें इराक और अफ़गानिस्तान युद्ध में तलाशी जा सकती हैं. बढ़ा रक्षा खर्च और कर राहत, ये दो मुख्य कारण हैं, जिनसे अमेरिका बुश के राष्ट्रपति निर्वाचित होने के समय जीडीपी के दो फ़ीसदी राजकोषीय अधिशेष से आज बजट घाटे और भारी कर्ज की स्थिति में पहुंच गया है. दोनों युद्धों पर सरकार का करीब 2 खरब डॉलर सरकारी खर्च हो चुका है.
लंबित और भविष्य के बिलों का भुगतान करने पर यह राशि 50 फ़ीसदी तक बढ़ सकती है. जैसा कि बिल्म्स और मैंने हमारी किताब द थ्री ट्रिलियन डॉलर वार में उल्लेख किया है, इन युद्धों ने अमेरिका को व्यापक ओर्थक कमजोरी की राह पर धकेल दिया. इससे अमेरिकी बजट घाटे और कर्ज की स्थिति गंभीर होती गयी. मध्यपूर्व में पैदा हुए व्यवधान से तेल की कीमतों में उछाल आया, जिससे अमेरिकियों को आयातित तेल पर अधिक खर्च करने पर मजबूर होना पड़ा, वरना इस राशि को वे अमेरिका में उत्पादित माल पर खर्च कर सकते थे. लेकिन अमेरिकी फ़ेडरल रिजर्व ने इन कमजोरियों को छिपाते हुए हाउसिंग क्षेत्र में बुलबुला तैयार किया, जिससे खपत में भारी उछाल आया. अब अत्यधिक ऋण और रियल एस्टेट क्षेत्र के उभार के विपरीत नतीजों से उबरने में वर्षो लग जायेंगे.
विडंबना यह भी है कि इन युद्धों ने अमेरिका और दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था को कमतर साबित किया है. एक अलोकप्रिय युद्ध ने किसी भी स्थिति के लिए सेना में बहाली को मुश्किल बना दिया है. युद्ध के खर्च के बारे में बुश न केवल देशवासियों को झांसा देते रहे, बल्कि सैनिकों की बुनियादी जरूरतों के लिए भी खर्च की मंजूरी नहीं दी. अमेरिकी सैनिकों की जान बचाने के लिए बख्तरबंद और बारूदी सुरंग प्रतिरोधी वाहनों की जरूरत थी और लौट रहे जांबाजों को बेहतर स्वास्थ्य देखभाल मुहैया करायी जा सकती थी. एक अमेरिकी अदालत ने हाल में कहा भी कि अमेरिकी सैनिकों के अधिकारों का हनन हुआ है. उधर, ओबामा प्रशासन कह रहा है कि सैनिकों के कोर्ट में अपील करने के अधिकार पर रोक लगा देनी चाहिए!
सैनिकों के साथ इस धोखे के कारण सैन्य शक्ति के उपयोग के बारे में घबराहट की स्थिति पैदा हो रही है. खतरा यह भी है कि दूसरों की नजर में इसने अमेरिका की सुरक्षा को कमजोर किया है. हालांकि अमेरिका की वास्तविक शक्ति सैन्य क्षमता और ओर्थक ताकत से कहीं ज्यादा इसकी ’सॉफ्ट पावर’ में छिपी है. लेकिन उसकी यह ताकत भी कमजोर हुई है, क्योंकि बंदी प्रत्यक्षीकरण और यातनाएं देने के मामले में बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ है. इससे अंतरराष्ट्रीय कानूनों के प्रति उसकी पुरानी प्रतिबद्धता अब सवालों के घेरे में है.
अफ़गानिस्तान और इराक में अमेरिका और उसके गंठबंधन के देश जानते थे कि लंबी अवधि की जीत लोगों के दिल और दिमाग को जीत कर ही हासिल की जा सकती है. पर, शुरुआती गलतियों ने युद्ध को जटिल बना दिया. अध्ययन बताते हैं कि दोनों देशों में पिछले दस साल में 1 लाख 37 हजार आम लोग मारे गये. अकेले इराक में, 18 लाख लोगों को शरणार्थी और 17 लाख को विस्थापित होना पड़ा है.
बजट घाटे और कर्ज से बढ़ती चिंता के बीच शीत युद्ध की समाप्ति के दो दशक बाद भी अमेरिका का सैन्य खर्च करीब-करीब बाकी दुनिया के सैन्य खर्च के बराबर है. इनमें से ज्यादातर राशि ऐसे हथियारों पर बर्बाद की गयी है, जिसे दुश्मन की पहचान नहीं होती है. अब इन हथियारों की नये सिरे से तैनाती की जरूरत है, जिससे कम खर्च में अमेरिका की सुरक्षा ज्यादा मजबूत हो सके. अलकायदा पर विजय भले न मिली हो, पर 9/11 के बाद इससे जितना बड़ा खतरा दिख रहा था, अब नहीं है. लेकिन इस स्थिति तक पहुंचने में अमेरिका ने जो विशाल कीमत चुकायी है, उसका नतीजा अभी अगली पीढ़ियों को भी भुगतना पड़ेगा.
(कोलंबिया विवि में प्रोफ़ेसर और नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री)
(प्रभात खबर से साभार)

बुधवार, 17 अगस्त 2011

अन्ना की ताकत

तुषार गांधी


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अन्ना हजारे की आवाज दबाने के लिए सरकार ने जो रास्ता अपनाया, उसे दमन और क्रूरता के अलावा और कुछ नहीं कह सकते। शासकीय अहंकार की पराकाष्ठा में और अपनी कमजोरियों के उजागर होने पर यह सरकार की बौखलाहट का ही नतीजा है। सरकार में बैठे जो लोग सांविधानिकजिम्मेदारियों की दुहाई दे रहे हैं, वे जाने-अनजाने देश के वातावरण को बिगाड़ने का काम कर रहे हैं। अगर उन्हें संविधान और नैतिकता की इतनी चिंता होती, तो अन्ना हजारे से बातचीत और समाधान के लिए दूसरे रास्ते तलाशे जाते। मगर सरकार बचकाने तर्क के साथ खड़ी है। हास्यास्पद है कि सरकार इसे पुलिस की अपनी कार्रवाई कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रही है।
इस प्रक्रिया में छिपे खतरों को भी समझना चाहिए। आप नक्सलवाद की बात करते हैं, अलग-अलग जगहों पर उठती भड़कती आग को बुझाने में लगे रहते हैं, लेकिन यह जानने का प्रयास नहीं करते कि ऐसा क्यों होता है। आखिर कौन-सी बात लोगों के मन में आक्रोश भरती है? जवाब यही है कि अगर शांति और अहिंसा के मार्ग पर चल रहे लोगों को आप शासक होने के नाते डराएंगे, धमकाएंगे, उनका उपहास उड़ाएंगे, तो समय के साथ क्रांति का बिगुल बज जाता है। आखिर लोगों का रोष कहीं तो निकलेगा।
एक डरी हुई सरकार जिस तरह गलती पर गलती करती जाती है, वही सब देखने को मिल रहा है। जरूरी नहीं कि अन्ना और उनके साथियों की सारी मांगें जायज हों। मगर सरकार ने जिस तरह हठधर्मिता दिखाई, उससे अन्ना के पक्ष में सहानुभूति की लहर दौड़ गई। सरकार की भूल है कि वह महंगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त देश की भावना को नहीं समझ पा रही है।
अब कोई अन्ना हजारे से कहे कि चुनाव लड़ लो, आपको अपनी ताकत का पता लग जाएगा, तो फिर पूछना पड़ेगा कि क्या चुनाव ही सबसे बड़ी कसौटी है? अगर चुनाव की सफलता ही नैतिकता और आचरण का प्रतिबिंब होती, तो हमारी संसद और जनप्रतिनिधियों के आचरण में वह नजर आता।
अन्ना हजारे ने बार- बार गांधीजी के सिद्धांत और नैतिकता की बात दोहराई है। अपने आंदोलन में वह गांधीजी से आशीर्वाद लेते हुए दिख रहे हैं। साफ है कि हमारे देश में परिस्थितियां बदलती रहेंगी, समय के साथ बदलाव भी होते रहेंगे, लेकिन रास्ता वही रहेगा, जो गांधीजी समझा-बुझा गए हैं। सत्ता में बैठे हुए लोगों के लिए भी और उन लोगों के लिए भी जो शासन के सामने अपनी कुछ बातें कहना चाहते हैं। अन्ना का रास्ता विशुद्ध गांधीवादी है या नहीं, इस पर अपनी-अपनी राय हो सकती है। जितना हम अन्ना हजारे को जान पाएं हैं, उसमें हम यह कह सकते हैं कि मुद्दों पर और कई पहलुओं पर आप उनसे सहमत-असहमत हो सकते हैं, पर उनकी नैतिकता पर शायद ही कोई सवाल खड़ा करे। वैसे अन्ना हजारे जिस लोकपाल बिल की बात कर रहे हैं, उसमें भी कुछ मामलों में असहमति हो सकती हैं, लेकिन जिस तरह उनकी बात को दबाने की कोशिश हुई, लोगों ने यही आशय लिया कि सरकार कुछ छिपाना चाहती है। मैं खुद अन्ना हजारे के जनलोकपाल बिल के कुछ पहलुओं से असहमति रखता हूं। लेकिन अब जब बात उससे आगे जनाधिकार की आ गई है, तो स्वयं उनके आंदोलन से अपने को जोड़ते हुए देखता हूं।
गिरफ्तारी के समय अन्ना का यह सवाल ही वाजिब था कि आखिर उन्हें किस कारण गिरफ्तार किया जा रहा है। सरकार को उम्मीद रही होगी कि जिस तरह बाबा रामदेव के रामलीला मैदान में आंदोलन को झेल लिया गया, वैसे ही अन्ना का आंदोलन भी शांत हो जाएगा। यही भूल है। सरकार ने अपने को आईने में नहीं देखा। सरकार यह नहीं समझ पा रही है कि आम आदमी किस तरह और किन हालात में त्रस्त है, दुखी है। कितना अजब है कि लोग महंगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त हैं और सरकार और सत्ता पार्टी के जिम्मेदार लोग प्रेस कांफ्रेंस करके सस्ते जुमलों के साथ चुटकी लेते हैं। सरकार और सत्ता पार्टी को भी अपनी बात कहने का हक है, पर कोई बात किस तरह कही जाए इसकी मर्यादा होती है।
आज हमारे देश में कई समस्याओं का आधार ही यह है कि सरकारों ने उनसे निजात पाने के बजाय उस पर अपनी राजनीति खेली। सरकार कितनी भी चालाक क्यों न हो, यह सवाल तो उसके सामने खड़ा ही है कि देश के तमाम उग्र संगठनों से तो आप बातचीत का हाथ बढ़ाते हैं, टेबल पर बातचीत की पहल करते हैं, यह हक अन्ना हजारे को क्यों नहीं दिया? उन्हें अपनी बात कहने पर जेल में क्यों डाला?
दरअसल देश में अभी आंदोलन की भूमिका बनी है। अन्ना हजारे इस मामले में सफल हुए हैं कि उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ देश भर में एक आह्वान छेड़ दिया है। उनकी गिरफ्तारी के बाद लोगों में गहरा आक्रोश झलकता है। असल आंदोलन अभी शुरू करने की जरूरत है। इस माहौल में उन खतरों से भी सजग रहना होगा, जिसमें राजनीतिक दल अपना फायदा टटोलना शुरू करता है। राजनीतिक पार्टियों की तरफ से मिली निराशा से भी अन्ना हजारे के आंदोलन को एक मंच मिला है। लोग यह नहीं चाहेंगे कि इसका इस्तेमाल विपक्षी राजनीतिक पार्टियां अपने हितों में कर सकें। इससे आंदोलन और उसकी राह भटक सकती है। देखना होगा कि अन्ना की गिरफ्तारी के बाद उनके साथी इस आंदोलन को किस तरह आगे ले जाते हैं।